बुधवार, 13 अप्रैल 2011

पता है आज बहुत बुरा दिन है

इतना बुरा कि क़यामत भी शरमा जाए

मगर बस फर्क इतना है कि आज का दिन हमेशा 
नहीं रहने वाला

कल फिर सुबह होगी 
 

कुछ नहीं

अब मै कुछ
नहीं कहूँगा 
कुछ भी नहीं 
एक लफ्ज़ भी नहीं निकालूँगा

क्योंकि अलफ़ाज़ परेशान करते हैं

छीन लेते चैन 
सुकून 
दिल का आराम 

न जाने क्यों रात भी आती है

हर वक़्त दिन होता तो
कमी नहीं महसूस होती  

तपता सूरज कुछ और सोचने नहीं देता
कुछ और कहने नहीं देता
मगर फिर ज़ुबान चुप कहाँ रह सकती है

मै कुछ नहीं कहना चाहता मगर फिर भी
कुछ लफ्ज़ फिसल कर उस किनारे चले जाते हैं

लेकिन अब मै कुछ नहीं कहूँगा
कुछ नहीं

...................
बस 

अब और नहीं

जितना सोचा था ये उस से 
ज्यादा मुश्किल है

ये वैसा ही है जैसे आग में जलना 
रोम रोम में जलन महसूस होती है
पानी डालने पे भी ये जलन नहीं जाती

 बस 

अब और नहीं 


मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

................................

ये वक़्त जब कोई 
बात नहीं हो रही होती

ऐसा लगता है कि बीच समंदर में 

जहाँ बिलकुल कोई हलचल नहीं 
मेरा जहाज़ आकर रुक गया है

फिर अचानक से जहाज़ का इंजन 
शुरू होता है 

एक थर थर कि आवाज से 
वो पानी को चीरते हुए फिर वापस 
चलने लगता है
कुछ वैसे ही दिल कांपते कांपते 
फिर से धड़कने लगता है
और साँसें बिलकुल पहले जैसी 
मालूम होने लगती है


नाम

कुछ नाम है मेरे पास

जिनका कोई मतलब नहीं 

आम तौर पर बेमतलब के नाम 
नहीं  होते 

वो तो रखे ही ऐसे जाते हैं 
जिनका कुछ मतलब हो

ऐसे जिन्हें रखने से असर पड़े

नेक लोगों के नाम पे
अच्छे  हौसलों के नाम पे
पर इस से कुछ असर पड़ते 
मैंने नहीं देखा कभी
 
हाँ 
लोग नाम की तौहीन करने में 
आगे रहते हैं ज़्यादातर

जैसे कल अब्दुल चौराहे  पे खड़े हो के 
गालियाँ बक रहा था

या वो राम जो शराब के नशे में 
अपनी बीवी को पीट रहा था

मै ये नाम

नीलाम कर दूंगा 

किसी अबस्ट्राकट पेंटिंग 
की तरह जो आजकल 
महंगे दामों में बिक जाती है
     

टूटे हुए मकान

कल रास्ते में मिल गया था मुझे

उस टूटे हुए मकान के बरामदे में
जहाँ अब कोई आता जाता नहीं

मै  घंटो वहां  बैठा रहता था पहले

तब उस मकान की टूटी ईंटे
बातें करती सी मालूम होती थी

वो कल शायद कुछ ढूंढते हुए वहां 
आया था

मुझे देख कर चौंक सा गया

थोड़ी देर तक कुछ भी नहीं बोला 
फिर पास आकर बैठ गया 

पूछने लगा   

हाल चाल 

बिलकुल अपनों की तरह जिनसे 
काफी वक़्त बाद मिलना हुआ हो

बहुत देर बैठ कर उस से बातें की 
जब वो जाने को हुआ तो 

कहने लगा की ये घर मेरा हुआ करता था

अब हम शहर के दूसरे सिरे में रहते हैं 

पर जाने क्यों मेरी रूह यही अटक गयी है
उसे ही ढूँढने चला आता हूँ

आज तुम्हे देखा तो लगा 
उसे भी कोई साथी मिल गया है

अब शायद मै सुकून से रह सकता हूँ
 

मुमकिन

मुझे नफरत है तुमसे 

इस वजह से नहीं की तुम में 
बुराइयाँ हैं बल्कि इस वजह 
से की मै एक भी ढूंढ नहीं पाता तुम में

तुम क्यों चारों तरफ फैले रहते हो

कभी दीवार पे नज़र आते हो
कभी खिड़की के उस पार दिखाई देते हो

कभी जो चाँद देखूं तो उसमे भी दिखते हो
कभी मेरी मेज़ पे रखे सूखे फूल में नज़र आते हो

मै नफरत करता हूँ 
क्योंकि तुम कभी दूर होते ही नहीं
पर ये पूरा सच तो नहीं 

तुम तो बहुत दूर हो

इतना की वहां पहुचना
इस जनम में तो मुमकिन भी न हो शायद


सोमवार, 11 अप्रैल 2011

बेकरारी

बेक़रार 
फिरते रहते हैं 
इन फिजाओं में 

जैसे कोई मुरझाया फूल
 फिर से खिलने की उम्मीद रखता हो

शायद कोई दवा ऐसी हो
जिसके पड़ने से  कुछ सूखे पेड़

भी फिर से वापस वैसे हो जायेंगे 
जैसा वो बहार के समय  हुआ करते थे

वरना फिर ये पेड़ 
 ये पेड़ वैसे ही रह जाते हैं जिनपे 
चिड़ियाँ अपने घोंसले बनती है

या फिर कोई लकडहारा

उसे काट कर 
किसी के घर के दरवाज़ों में लगा देगा

 पर ये बेकरारी 
कभी खत्म तो होगी 

पर तब तक शायद 
बहुत देर हो जाए
......

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

हद

हद 
बहुत मुश्किल है मापना 

अपनी हद से बाहर इंसान कब चला 
जाता है उसे पता भी नहीं चलता

 कल तक जो चीज़ हद से बाहर 
थी 
अब वो आम बात हो गयी है

साथ ही कुछ नयी हदें बन आई हैं 

जैसे कोई बाधा दौड़ हो
जिसमे एक के बाद एक
नयी मुश्किलें 
आप पार करते रहें 


शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

अफ़सोस

मेरे रास्ते अब मुझ से 
कहते है इतना तेज़ न चलो

इतना तेज़ नहीं की कुछ देख न पाओ
कितने मोड़ पीछे छूटे जाते हैं
    
कितने ख्वाब मुड़े जाते हैं
उन्हें खोल के देखो 

पढो उन्हें ,समझो उन्हें
थोडा महसूस करो

यूँ न करो 
कि देख के उन्हें अनदेखा कर दो

वरना वो भी एक दिन ऐसा ही करेंगे 

और उस दिन
सिवा अफ़सोस के तुम कुछ नहीं कर पाओगे...