शनिवार, 23 अप्रैल 2011

आखिर

ग़लत चीज़ें खींच लेती है अपनी ओर

क्योंकि उन्हें करने के लिए हिम्मत 
की दरकार होती है?
या वो बहुत आसान मालूम होती हैं?
 
या बस ऐसे 

कुछ सही करने में भी तो वक़्त लगता है

कितना कुछ चाहिए होता है
थोडा वक़्त और बहुत सारा ध्यान 

गौर करना पड़ता है बारीकियों पर

 लेकिन इस दरमयान 
पता ही नहीं चलता
कि आखिर हो क्या रहा है?

जुबां

मै उस जुबां में क्यों 
बोलना चाहता हूँ जो मुझे आती ही नहीं

सीखनी पड़ती है थोड़ी देर के लिए

मगर फिर भूल जाता हूँ

ज़रुरत मगर फिर भी आ ही जाती है

क्योंकि मै जो बातें 
ऐसे करता हूँ जैसे मुझे पसंद है 
 
तो वो लोगों को समझ नहीं आते

और कभी तो मुझे कुछ कहना ही नहीं पड़ता 
सुनना पड़ता है 

वही दोहराई गयी बात
नए तरीके से भी नहीं

बिलकुल वैसे ही पहले की तरह..

गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

तुम मुझे शब् के अँधेरे में बुलाया न करो
रात भर मेरे खवाबों में यूँ आया न करो
 ....
लगा के आग क्यों कहते हो है नहीं जलना 
गर यही बात है ये आग लगाया न करो

कभी जो शाम ढले ,ज़िन्दगी उदास होगी
मगर कसम है मुझे ऐसे पाया न करो

.....

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

दीवार

कभीं दीवार भी कह उठती है 
ऐसा मत बोलो

मेरे कान तो होते हैं 
पर वो ये सुन नहीं सकते

हज़ार बार सही  हैं
और एक बार नहीं

वो बीमार तो है पर कहता है 
बीमार नहीं

कुछ दाग लगे हैं 
मगर वो धुल नहीं सकते 


रविवार, 17 अप्रैल 2011

........................

अँधेरे कमरे 

में बैठे बैठे

चार बातों से लड़ बैठता हूँ

दो मुझसे रूठ के चली जाती हैं
दो मुझे मनाने लग जाती हैं


शनिवार, 16 अप्रैल 2011

पसंद नापसंद के वजूहात 
ढेरों हो सकते है कभी कभी 

और कभी एक वजह भी नहीं होती 

सिर्फ दिल में एक आवाज़ होती है 

जो पहले कभी दबी दबी सी थी 

अब अचानक वही चीज़ 
जोर जोर से चीखने लगती है 

.........

कागज़

बहता रहता हूँ मै

अपनी कुर्सी पे बैठे बैठे

मेरी मेज़ पे बिखरे कागज़ 
उड़ते हुए जाना चाहते हैं

जैसे आजाद होना चाहते हों

मै उन्हें मोड़ कर
रद्दी की टोकरी में ड़ाल देता हूँ

जैसे कुचल देता है तूफ़ान 
रास्ते में आने वाली हर चीज़ को

मेरी कलम के रंग उन कागजों से 
झाँक कर मुझे मुँह चिढाते हैं

हर घडी 
हर पल

जादू करते रहते हैं  

क्यों करते है?
तुम्हे कुछ पता है क्या?


जागना पहले मुझे कभी इतना 
बेहतर नहीं लगा
 
खुली आँखें थकी थकी सी 
अच्छी लगती हैं

जैसे इंतजार हो 
कभी न ख़तम होने वाला इंतज़ार
 

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

लोरी

रात को जब नींद नहीं आती

अजीब अजीब सपने आते हैं

घने जंगल में 
किसी के चीखने के सपने 

धूल भरी आँधियों के सपने
तपते सूरज में जलने के सपने

फिर वो चले भी जाते हैं

जैसे मकसद सिर्फ मुझे डराना हो

 मुझे डर भी लगता है उस वक़्त
बहुत ज्यादा 

मगर फिर आंधियां रूक जाती 
चीखने का शोर थम जाता है

तपता सूरज ठन्डे चाँद में तब्दील हो जाता है

और फिर मुझे नींद आ जाती है...

भला ऐसी लोरी
मुझे रोज़ क्यों सुननी पड़ती है


जो बिलकुल भी मीठी नहीं लगती...