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बुधवार, 13 अगस्त 2014

ग़ज़ल,

अब किसी हाल में न बदलेंगे ज़माने वाले,
चाहे फिर जान से क्यूँ न चले जाएँ, जाने वाले।

इश्क़ मज़हब है यक़ीनन, मगर ये मत मानो,
मुठ्ठी भर लोग हो तुम, लाखों हैं सताने वाले।

तुम तारीख बदलने का हुनर तो रखते हो,
कहाँ मिटते हैं मगर, तारीख मिटाने वाले।

सच कह के हार जाते हैं जो हैं दिलवाले,
झूठ कह कर के बचा लेते हैं, बहाने वाले।

आग हर कोई लगा देता है फ़िक्र मत करना,
बड़ी मुश्किल से पर मिलते हैं, बुझाने वाले।

किसी का इंतज़ार मत करना, उम्र भर ऐ दिल,
बहाने ढूंढ ही लेते हैं , न आने वाले।

बुधवार, 6 अगस्त 2014

ग़ज़ल,

ज़िंदगी का हिसाब रखते हैं
लोग इसकी किताब  रखते हैं।

जिनको ख्याल है और थोड़ी फ़िक्र भी
वो अपने हिस्से अज़ाब रखते हैं।

अपनी ख्वाहिशें कम नहीं करते
लोग आरज़ूएं बेहिसाब रखते हैं।

लोग उनसे नहीं पूछेंगे सवाल
जो अपने पास जवाब रखते हैं।

वो अंधेरों से फिर नहीं डरते
जो दिलों में आफताब रखते हैं।


बुधवार, 30 जुलाई 2014

ग़ज़ल,

तुम भी कह लो तुम्हें जो कहना है
हम भी सुन लें और चुप हो जाएँ

ज़िंदगी है , तो उलझनें भी होंगी
क्या करें अगर न खो जाएँ

किसी के हिस्से तो आना है मुझको
नहीं अपने तो तेरे हो जाएँ

रात इतना तो करम कर मुझ पर
ख्वाब आएं न आएं हम सो जाएँ


शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

ग़ज़ल,

शक़ नहीं है तुझ पर, मगर यक़ीं भी नहीं
सर ए आसमाँ न दिखा, पैरों तले ज़मीं भी नहीं।

तुझको होगा ये मुग़ालता कि तू है कोई ,
मै देख पाया वजूद अपना, पर कहीं भी नहीं।

दिल पे बातों से असर होता है नफ्स के जितना,
कर पाती है असर उतना, महज़बीं भी नहीं।

ज़िंदगी रोज़ कहाँ ज़िंदा रखती है हमें "शाहिद"
रोज़ मर जाएँ हम, कुछ ऐसे आदमी भी नहीं।

-  शाहिद अंसारी

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

ग़ज़ल,

लफ्ज़ मेरे थे कहानी उसकी ,
खून मेरा था रवानी उसकी।

दर्द दोनों को मिला था लेकिन ,
लोग कहते थे, कारस्तानी उसकी।

बाग़  में फूल खिलाया किसने?
पौधे मेरे थे बागबानी उसकी।

क़त्ल किसने किया ये क्या मालूम,
नाम आया "शाहिद" का ज़ुबानी उसकी।

- शाहिद अंसारी


सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

ग़ज़ल,

मय जो आती है तो आए चाहे जिस रात आए
वो शब् ए वस्ल आए या शब् ए फ़िराक आए।

आयी जब भी शब् ए फ़िराक उनकी याद हमे,
हम घर तो लौटे मयकदे से मगर नमनाक आये।

नींद आ भी गयी जो आसानी से बिस्तर पे तो,
ख्वाब जगा गए ऐसे जो खौफनाक आये।

पूछा जिसने भी तुमसे हाल ए दिल "शाहिद"
जुबां से लफ्ज़ भी कुछ ज्यादा बेबाक आये।


शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

ग़ज़ल,

तुझे देखूं तो , जादू सा असर होता है ,
कौन कहता है , इश्क़ आसान सफ़र होता है।

उसकी बातें मुझे फूल  सी लगती है ,
लोग कहते हैं , उसकी बातों में ज़हर होता है।

हम तो कबसे अपने हाथ उठाये हुए हैं दुआ में ,
जब से जाना है , कि दुआओं में असर होता है।

सबके चहरे से नक़ाब हट जाता है तब,
दिल जब किसी का , दर बदर होता है।


रविवार, 9 अक्टूबर 2011

ग़ज़ल

फिर रात चाँद आया , मगर तुम नहीं आये;
सावन भी लौट आया, मगर तुम नहीं आये...
 
अरसे रहा था जिस ख्वाब, का इंतजार मुझको;
वो ख्वाब तो पूरा आया , मगर तुम नहीं आये...

अब न वो शहर रहा, न वो लोग "शाहिद";
वक़्त सारा गुज़र तो आया, मगर तुम नहीं आये...

मै मील के आखिरी पत्थर से भी पूछने निकला;
वो बोला लोग तो सब आये, मगर तुम नहीं आये..

तुम्हे दोस्तों में गिनूं की, करूं दुश्मनों में शरीक;
मेरे मरने पे तो सब आये, मगर तुम नहीं आये..

-शाहिद

ग़ज़ल

एक आरज़ू मेरे दिल से, निकाली न गयी;
सर पे मुश्किलें वो आई , कि टाली न गयी..

उसकी हर बात, मेरे दिल के पार हो ही गयी;
तीर जुबां से जो चलाये, वो खाली न गयीं.

इश्क एक आग का दरिया है, जिसे दूर से देखो;
जो फिसले है वहां उनसे ,हालत अपनी संभाली न गयी..
 
जो बर्बाद-इ-इश्क हैं, वो ही बताएँगे किस्सा अपना ;
जो दिल एक बार टूटा, हसरतें फिर नयी पाली न गयीं.

कितनी ही खुशियाँ खरीद लाये, जहान से तुम;
मगर न जाने क्यों , इस दिल से ये तंगहाली न गयी...


गुरुवार, 29 सितंबर 2011

...ग़ज़ल,

उस रोज़ इस तरह से, मुझ से मिल के तू गया;
एक  आरज़ू तेरे नाम से, जग जाती है हर रोज़...

मै रात से हर रोज़, कहता हूँ कि छोड़ दे;
ये रात ऐसी है , मुझे बहकाती है हर रोज़..

मै उसे भूल भी जाता हूँ , हर रोज़ फिर भी क्यों;
उसकी याद ऐसी है जो, आ जाती है हर रोज़..


बुधवार, 29 जून 2011

ग़ज़ल

जलता रहता है सीने में ,निकलता नहीं धुआं 
दिल का ये कोना छोड़ के, फिर जाएगा कहाँ

आज आ के मुझसे बोल दे, तू दिल की सारी बात,
दिल के ये सारे राज़, तू छुपायेगा कहाँ

तुझे देख के ही होता है मुझको हर दिन नसीब
दिल का मैं ये चैन अब फिर पाऊंगा कहाँ

हर रास्ता ले जाता है क्यों मुझको तेरी ओर
ये रास्ता भी छोड़ के मैं जाऊँगा कहाँ
   
.....

बुधवार, 26 जनवरी 2011

मेरी गलियों में आना छोड़ देना
वक़्त ना  मिलने का बहाना छोड़ देना

जो खुद तक पहुच रही हो लपटे
तब फिर आग बुझाना छोड़ देना

जब तलक मतलब था ज़माना साथ था
अब नहीं तो क्या ,ज़माना छोड़ देना




गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

ग़ज़ल

एक तुमसे ही कुछ उम्मीद थी पर ये क्या जाना
आज तुमने भी कह दिया कि अब नज़र ना आना

लोग ज़ालिम है उन के ताने मैंने सुन थे लिए
तू तो अपना था मगर तूने मुझे क्या जाना

अब खोने को बचा क्या है ,अब है कैसा डर
जो खोया तुमको तो अब मुझको है क्या पाना

ग़ज़ल

मुझे बस इतना कहना है कि मुझे बोलने दो
मेरी बात भी सुन लो कभी खुदा के लिए

बरस पड़ो ना मुझ पे, ना गरजो बादल की तरह
मेरी राय भी ले लो कभी सजा के लिए

बला का ज़ोर है तूफ़ान में जब वो उठता है
मेरी रूह तड़पती है जब वफ़ा के लिए

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

ग़ज़ल

मेरे दिल से तेरा दिल कुछ करीब सा है
मुझसे तेरा ये रिश्ता कुछ अजीब सा है

ये तो बस समझने का फर्क है वरना
कोई दोस्त लगता है,कोई रकीब सा है

कुछ तो फर्क है जो दोनों अलग से हैं
तू खुशनसीब सा है,वो बदनसीब सा हैं

बुधवार, 17 नवंबर 2010

ग़ज़ल

खुदा ने गर चाहा फूल खिलने लगेंगे सेहरा में
अभी कुछ और दुआ करने की ज़रुरत है...

तबियत सुधर जायेगी बस ये  समझो
ये जो आब-ओ-हवा है,बदलने की ज़रुरत है..

रास्ता पथरीला है फिर भी तय हो जाएगा
थोड़ा सा संभल के चलने की ज़रुरत है ..

मुझपे है क्या गुजरी ये समझने के लिए
तुम्हे ज़रा सा पिघलने की ज़रुरत है...

तुम भी खरे हो जाओगे तप के
थोड़ा सा आग में जलने की ज़रुरत है..

शनिवार, 7 अगस्त 2010

,तुम से है.

मेरी सुबह-ओ-शाम की इन्तहा तुम से है
इस बेजान जिस्म में कुछ बची जान, तुम से है

घर तो मेरा कब का उजाड़ गया है लेकिन
जो भी बचा खुचा है बियाबान, तुम से है

शहर वीरान है सड़के पड़ी है सूनी सूनी
ढूंढता फिर रहा हूँ वो ज़मीन जिसकी पहचान, तुम से है

कई दिनों से कुछ लोग आ के कह जाते है
वक़्त जो ले रहा है इम्तेहान उसका रिश्ता,तुम से है?

क्या बचा है जो खोने का ग़म मनाऊँ
 मुझे जो भी मिला उसका गिला बस ,तुम से है.

   # shahid

शनिवार, 16 जनवरी 2010

हमे पता था कि हालात भी बदलेंगे
पर इतना बदल जायेंगे ये नहीं सोचा;

तमाम उम्र सोचते रहे कि क्या सोचे
सिवा तेरे हमने कुछ और नहीं सोचा;


मुश्किलों से घबरा के हार मान बैठे
आसान मुश्किलें ही होती है नहीं सोचा;