गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

गवाह....

नहीं उड़ते परिंदे ये डर किसका है;
खौफ आँखों में है पर दिखाई नहीं देती.

खुशबू फूलों कि छीन ले गया है जो
उसकी आवाज़ भी अब कहीं सुनाई नहीं देती.

तंज़ बातों में ये अचानक नहीं आया;
कुछ बातें होती है जो बताई नहीं जाती.

नज़रें ढूंढती है अब भी किसी के आने कि राह

जाने क्यों कुछ गलतियाँ दोहराई नहीं जाती.

चाहे कितना भी बरपा हो शोर तुम्हारे अंदर
लोग बहरे है शहर के उन्हें सुनाई नहीं देती.

"शाहिद" गवाह है कितने ही किस्सों का;
कुछ कहानियां तमाम उम्र भुलाई नहीं जाती.

सोमवार, 1 मार्च 2010

बस एक ख्याल...

एक अजीब ख्याल है वो
जैसे दोबारा कोई निगाह
डाले और हर दुसरे पल वो अलग नज़र आये

औरों से बिलकुल जुदा
एक पुरसुकून सी आवाज़
जब कहीं से आये तो
यूँ लगे कि मौसम अचानक खुशनुमा हो गया हो

एक फरेबी शक्ल का नकाब
जो छिपाए रखता है सबसे
एक हकीकत जो उतनी ही सच है
और उतनी ही कडवी

पर फिर भी कुछ है
जो उलझाए रखता है हर घड़ी हर वक़्त

बस एक ख्याल...

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

वो जो कहता था खुदा पूरी करता है मुरादें  सबकी
आज आ बैठा हैं मैखाने में खुदा खुदा करके

बेमतलब की बातों में क्या रखा है "शाहिद"
अब समझ आया है हर चीज़ का तजरबा करके

अब न वो मंज़र है, न वो लोग, न कैफियत है बाकी
सिर्फ वही दर्द है जो उठ पड़ता है रह रह के

कभी समंदर ,कभी तूफ़ान ,कभी हवाओं से
अब थक गया है उसका जी सभी से लड़ लड़ के

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

धुल जो जम गयी है एहसासों पे
जैसे महीनो कोई हलचल न हुई हो

कल अचानक कुछ बूँदें टपक पड़ी
और उनपे लिखी इबारत नज़र आ गयी

एक अरसे पहले अपने हाथों करीने
से कुछ लिख दिया था यूँही;नहीं पता
था वो हम से कुछ ऐसे चिपक जाएगा

तब से कितने सावन गुज़रे पर वो गर्द
कभी साफ़ न हुई.

शनिवार, 30 जनवरी 2010

लोग किताबों में मतलब ढूँढा करते हैं;
जिंदगी इतनी उलझी हुई तो चीज़ नहीं.

हर मुलाक़ात आखिरी सी लगती है;
पर वो मेरे इतने तो करीब नहीं.

शनिवार, 16 जनवरी 2010

हमे पता था कि हालात भी बदलेंगे
पर इतना बदल जायेंगे ये नहीं सोचा;

तमाम उम्र सोचते रहे कि क्या सोचे
सिवा तेरे हमने कुछ और नहीं सोचा;


मुश्किलों से घबरा के हार मान बैठे
आसान मुश्किलें ही होती है नहीं सोचा;

रविवार, 27 दिसंबर 2009

रक़ीब.....

हो कहीं भी दिल के करीब है, तू अभी भी मेरा हबीब है..
जो टूट गया वो तो ख्वाब था,जो है रह गया वो नसीब है

वो उतर गया जो खुमार था, ये तो दो दिनों का प्यार था
जो गुज़र गयी है वो दास्ताँ, मेरे दोस्तों कितनी अजीब है...

चाहे सुबह हो या के शाम हो, इस ज़ुबां पे बस तेरा नाम हो
तुझे ले गया मुझसे छीन के, वो खुदा ही मेरा रक़ीब है....

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

निभाए जा रहा है...

कोई दर्द है जो उसको खाए जा रहा है
कोई राज़ वो सबसे छिपाए जा रहा है....

कुछ नहीं बाकी है इस रिश्ते में फिर भी
कुछ बात तो है जो निभाए जा रहा है....

हर कोशिश नाकाम हुई है अब तक, कि ये
उसका सब्र है की कुछ नया आजमाए जा रहा है...

दिल ही दर्द देता है और दुआ भी"शाहिद"
ये बात बारहा दोहराए जा रहा है...

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

रिश्ते खून के नहीं छूटा करते ..

रिश्ते खून के नहीं छूटा करते

कल कह दिया था जिस से की
जाओ अब कोई नाता नहीं तुमसे
चला गया था वो मुड़ के देखते हुए

उम्मीद थी उसको की
अब नहीं लौटेगा वापस
नहीं देखने आएगा एक बार भी ये घर

कुछ दिनों में दुनिया की बातों
में वो भी खो गया था
अपने बचपन के दोस्तों की तरह

पर आज खबर देख के रहा न गया उस से
अगली सुबह ही देखने पहुच गया
और चाँद लम्हों में ही आंसुओं में
अपनी साड़ी कड़वाहट धो दी.

नाराज़गी .....

थामेगा हाथ कौन अगर ये देखना है तो
ऐसे ही कभी तो कहीं पे लड़खड़ाइए ....
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ज़ुबां और आँखों की बयानी में फर्क बहुत है
दोनों में किसकी माने पहले ये बताइए....
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बात बात पे रोने की आदत है ये बुरी
ऐसी भी क्या बात है अजी मुस्कुराइए...
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गुस्से में सूरत भी  बहुत लगती है हसीन
दिल फिर भी कहता है अमा मान जाइए...
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