शनिवार, 1 मई 2010

अपने जैसा........!

कसमसा के रह गया मै
कुछ कहना चाहता था , नहीं कह पाया

बात आई गयी हो गयी

टीस एक रह गयी मन में फिर भी
गुस्सा दबा रह गया मन में ही


इसी तरह इकठ्ठा की गयी चीज़ें
भारी कर देती है दिल मेरा

कभी कभी मन करता है निकल दूं सारा गुस्सा
सारा ज़हर जो रगों में दौड़ रहा है

और फिर से एक मासूम बच्चा बन जावूँ


फिर से नयी कलम से कुछ लिखू नया
फिर से  इन आँखों से कुछ पुराना पढूं

और इसी तरह जो बदल नहीं प् रहा है उसे
किसी तरह से बदल के मै अपने जैसा हो जावूँ

2 टिप्‍पणियां:

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

टीस एक रह गयी मन में फिर भी
गुस्सा दबा रह गया मन में ही

इसी तरह इकठ्ठा की गयी चीज़ें
भारी कर देती है दिल मेरा

सुन्दर प्रस्तुति के लिए ..... बधाई स्वीकारें

http://athaah.blogspot.com/

बेनामी ने कहा…

bahut hi khubsurat rachna....
humse rubaroo karaane ke liye dhanyawaad.........