सोमवार, 19 जून 2017

एक चुटकी उदासी

देना चाहता हूँ एक चुटकी 
उदासी तुमको भी ,

तुम भी छटांक भर 
ख़ुशी मुझे लौटा देना।  

दिन बड़े छोटे कहाँ 
होते हैं,

दिन तो मीठे और फीके 
होते हैं।  

थोड़ी सी मिठास 
भर जाती है 
अगर तुम्हारा चेहरा नज़र आ जाता है ,

जब दूर हो 
तो बस आवाज़ ही काफी है। 

पर कभी कभी मन नहीं लगता,

ऐसे ही जैसे 
बोरियत हो जाती है,
दिन रात से ,

बैठे रहने से ,
सोते रहने से ,
उठने से ,

चलने फिरने से भी मन ऊब जाता है। 

फिर याद आती है तुम्हारी,
तुम्हारी आँखों की ,
तुम्हारी बातों की,

तुम्हें छूने के पल याद आते हैं। 

फिर नए जीवन की 
कोशिश तो करनी ही होती है। 

इंसान रुक ही तो नहीं सकता ,
रुकना जैसे कोई बहुत भारी चीज़ हो ,

मन करता ही कोई खुद रोक दे ,
पुकार ले ,
किनारे से ,

या फिर कोई नाव लेकर आ जाए। 

बुधवार, 30 नवंबर 2016

ग़ज़ल,

दिल-ए-बर्बाद, को दिल-ए-आबाद कहिए,
सिनेमा में खड़े होके, ज़िंदाबाद कहिये।

कहने वाले तो, क्या कुछ नहीं कह जाते,
क्यों न  फिर आप, हाल-ए-बेदाद कहिये।

ये मुल्क थोड़ा आपका भी तो है शायद,
कह डालिये, जो इसको जायदाद कहिये।

रहते हैं तो रहिये हज़ार पहरों में ,
खुद को लेकिन, मगर आज़ाद कहिये।




वही लोग

वही लोग मारे जायेंगे ,
वही लोग देख कर ताली बजायेंगे ,
जो मारेगा उसी की पूजा करेंगे,
जो मरेंगे वही लोग पूजा करेंगे।
वो जो पहले मुर्गों को लड़ाते थे,
अब लोगों को लड़ाते हैं,
ये देख कर वही लोग फिर
नारे लगाते हैं।
जो मरे हुए लोग हैं वो ज़िन्दा लोगों
को देख कर हंसते हैं,
मरे हुओं को अपने मरने का यक़ीन नहीं हैं,
वो ज़िन्दा लोगों से अपने मरने का सबूत मांगते है।
जज सुनवाई नहीं करता है,
जो सुनवाई करता है वो जज नहीं है।
जिसकी लाठी उसकी भैंस है,
जिसकी भैंस है उसका कोई नहीं है ।
बहरों का शहर हैं,
गूंगों ने संभाला है,
जो बोल सकते हैं उनकी
ज़ुबानों पे ताला हैं ।

जन्नत का ख्वाब

जन्नत का ख्वाब
एक एैसा ख्वाब है
जिसको दिखाने से सब कुछ हो सकता है।
ये ख्वाब 
लोगों के लिए एक नशा है।
लोग जन्नत में इतना यकीन करते हैं,
कि आंखों के सामने दिख रहा सच
छलावा लगता है ।
लोगों को कह दिया जाता है कि
बस इतना सह लीजिए,
सब्र कीजिए,
उसके बाद सब आसान हो जायेगा।
लोग इस अफवाह पर यकीन कर लेते हैं।
जो यकीन नहीं करते
उनको जबरन मनवा दिया जाता है।
सवाल न तो दुनियावी जन्नत के बारे में
किया जा सकता है,
न तो आसमानी जन्नत के बारे में
किया जा सकता हैं,
सवालों से जन्नत के सौदागर खौ़फ खाते हैं ।

जन की बात

पहले जन की बात कीजिए,
फिर जन धन की बात कीजिए।
उसके बाद मन की बात कीजिए।
जब इस से काम ना चले,
तो काले धन की बात कीजिए ।
फिर देश की बात कीजिए,
उसे जनता तक पहुंचाने के
संदेश की बात कीजिए।
सफर की बात कीजिये
मुश्किलों की बात कीजिये,
चलने की बात कीजिये,
मुश्किल समय में आप के ढलने
की बात कीजिए ।
बार्डर की बात कीजिये,
आर्डर की बात कीजिये,
कुछ गीत की बात कीजिये,
संगीत की बात कीजिये,
आभासी शत्रुओं पर जीत
की बात कीजिए ।
बातों ही बातों में
सब बदल जायेगा,
वो ख्वाबों वाला सुनहरा
कल भी नज़र आयेगा ।
उम्मीद नज़र भले न आये
आंख गडा़ये रहिए,
चाहें जैसे भी हो
बात बनाये रहिए।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

रेडी मेड

बदलाव वक़्त के साथ 
देखने में 
सुनने में 
और सबसे ज़्यादा समझने में 

कब होगा ?
मत पूछिए। 

पूछिए वो सवाल 
जिसका जवाब तैयार हो
बना बनाया , रेडी मेड।  

आजकल मेहनत नहीं करना चाहता कोई ,
सबको जल्दी है 
आगे जाने की 

और उसे से भी ज़्यादा पीछे छोड़ने की 
अपने आस पास के लोगों को 
दोस्तों को 
पियर  ग्रुप को 
पड़ोसियों को 

नहीं देख पाते वो कि 
क्या छूट रहा है पीछे 

वो खुद छूट रहे हैं 
उनका वजूद 

जिस कद को बढ़ाना चाहते हैं 
वो घट रहा है 
दूसरों की नज़र में 
खुद की नज़र में भी शायद 

लेकिन फिर भी 
इस चूहा दौड़ में शामिल होना है ,

लोग बदलाव के सवाल का सामना नहीं करना चाहते 
मत पूछिए ऐसे सवाल 
बन जाइये रेडी मेड 
मेड इन इंडिया। 

शनिवार, 23 जुलाई 2016

तुम चली आओ।

तुम होती तो रौशनी होती
तुम होती तो सितारे चमकते

आज तुम नहीं हो
तो दिल नहीं लगता,

बिस्तर, तकिया, कम्बल
सारे तुम बिन
सिकुड़े सिकुड़े से हैं ,

घर में एक हंसी की गूँज
की बेहद ज़रुरत है ,

तुम चली आओ।

तुम नहीं होती तो होंठ सूख जाते हैं
तुम नहीं होती तो आँखें भीग जाती हैं ,

तुम्हें पता है कि
मुझे अकेले खाना अच्छा नहीं लगता,

एक अकेली प्लेट
राह तकती है,

घर में तुम्हारी प्लेट इंतज़ार करती है

तुम चली आओ।

तुम नहीं होती तो मैं बाहर नहीं जाता
तुम नहीं होती तो ठंडी हवा नहीं आती

घर में बस एक खुश्क
सा मौसम बना रहता है,

इस मौसम को बदलने के लिए
मेरी जान

तुम चली आओ।  

शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

भीड़

एक आग सी लगी है चमन में

लोग आपके फैसले भीड़ के
ज़रिये लेते हैं,

भीड़ जिसका कोई चेहरा नहीं होता,
पर भीड़ का आतंक होता है,

कायर लोग जो अकेले कुछ नहीं कर पाते
भीड़ के साथ हो जाते हैं,

अपनी कुंठा निकालते हैं
एक निरीह आदमी पर,

पहले उसपर कुछ झूठे
आरोप लगाये जाते हैं ,

ऐसे आरोप जिनसे भीड़ का खून
खौल उठे,

वही भीड़ जिसका खून समाज की अनेक
बुराइयों को देखकर ठंडा पद जाता है,

किसी ऐसी बात के लिए खौल उठता है
जो बात किसी भी सभ्य इंसान के लिए
एक छोटी बात हो सकती है,

भीड़ के अंदर भयानक गुस्सा भरा पड़ा है,

कहाँ से आया ये गुस्सा?
क्या बरसों से उन्हें ये सिखाया पढ़ाया जा रहा है?

कोई भीड़ को शांत रहना क्यों नहीं सिखाता?

कुछ लोग सिखाते तो हैं,
पर उनको मार दिया जाता है।

इसलिए क्योंकि वो शान्ति की बात करते हैं।

शान्ति की बात करना अपराध है,

इसलिए गुस्से की बात कीजिये
ऐसी बात कीजिये जिससे खून में उबाल आये।

भीड़ को ये पसंद आता है,
अगर आपको नहीं पसंद और आप भीड़ के साथ
नहीं हैं तो आप भी मार दिए जाएंगे,

लेकिन तभी अगर आप बोलें,

अगर आप चुप रहें तो सब ठीक है,
बिलकुल इस देश की तरह,
जहाँ सब ठीक है,

अमन चैन और भाई चारा है,

लेकिन फिर ये भीड़ इकठ्ठा कैसे हो जाती है ?
कौन बुलाता है ऐसे लोगों को एक साथ ?

आजकल नए साधन आ गए हैं
सोशल मीडिया
वाट्सएप्प

इसके माध्यम से घृणा फैलाई जाती है,

लोग इन साधनों का उपयोग गुस्सा निकलने के लिए
करते हैं,

यदि इनका गुस्सा न निकले
तो ये आग में घी डालने का भी काम करते हैं।

लेकिन ये सब पैदा कहाँ होता है ?

ये सब पैदा होता है पाठशाला में
पाठशाला में सिद्धांत पढ़ाये जाते हैं,

उस से शिक्षित लोग घृणा की सामग्री तैयार
करते हैं,

और फिर ये सामग्री भीड़ में बाँट दी जाती है।

क्या भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता ?

नहीं भीड़ का अपना कोई दिमाग नहीं होता
भीेड़ के मास्टरमाइंडस होते हैं,

क्योंकि भीड़ भेड़ों की तरह होती है ,
वो बस सीधी राह में चलती जाती है।

तो इन मास्टर माइंडस को सरकार रोकती क्यों नहीं ?

मास्टर माइंडस हमेशा शासन में होते हैं,
सरकार उनकी होती है ,
मशीनरी उनकी होती है ,

वही लोग मलाई खाते हैं
उनके लिए सत्य असत्य कुछ नहीं होता
धर्म अधर्म कुछ नहीं होता

भीड़ के लोग ही अपने में से किसी एक
को मार देते हैं

मरती भी भीड़ ही है
मारती भी भीड़ ही है
नुक्सान भी भीड़ का ही होता है

फायदा किसका होता है फिर ?

उनका जो भीड़ के साथ है
और भेड़ों को चराते हैं।

फिर किसी भेड़ को ज़बह कर के
उसका मांस रोटी के साथ खाते हैं।

किस भेड़ को ज़बह करना है इसका
चुनाव कैसे होता है ?

नॉर्मली वो भेड़ जो सवाल करती है उसका नंबर
पहले आता है
कभी कभी प्रोबेबिलिटी के हिसाब से होता है
कभी रंग के आधार पर
कभी इस आधार पर की उसके घर पर कौन सा झंडा है
कभी इस आधार पर की उसको प्रेम किस से है
कभी इस आधार पर की वो पैदा किस घर में हुआ है
कभी इस आधार पर की वो क्या खा रहा है

और जब कोई वजह नहीं होती तो वजह पैदा कर दी जाती है। 

गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

पहेलियाँ , ख्यालों की

बेख्याली का कोई ख्याल
खुद से परे और खुद से दूर भी नहीं

जैसे किसी दिये  की खुशबू
जो जलता कहीं और है और
रौशनी यहाँ करता है

उस पर ये यक़ीन कि मेरा यक़ीन
जिस पर है , वही सच है

जैसे भटके हुए सारे लोगों को
लगता है , कि जिस पर वो चल रहे हैं
वही सही रास्ता है

क्या पता कुछ और भी हो ?

क्या हमारे पास वक़्त है देखने को?
ढूंढने पर क्या मिल जाएगा दूसरा रास्ता ?

कोई तलाश भी क्यों करे ?

शायद रास्ते भी
अपना राही खुद चुनते हों

शक और यक़ीन के बीच का एक ख्याल
उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच से जाता है

वो ख्याल जलाता है
गरम रखता है
पिघलाता है

ख्याल जो कभी दूर नहीं जाता
ख्याल जो कभी पास नहीं आता

कुछ दिनों से उमड़ रहा है बादल की तरह
बिखरा हुआ ख्याल

क्या आने वाली बरसात में बिजली की तरह गरजेगा?
या चुप चाप चला जाएगा
इस ज़मीन से समंदर की तरफ

शायद ऊपर वाला कुछ कहना चाहता हो
तुमने सुनी है क्या कोई आवाज़?

परिंदे तो शायद कुछ और तलाश करते हैं
पहेलियाँ इंसानों के लिए बनी होती हैं

पहेलियाँ , ख्यालों की 

बुधवार, 18 मार्च 2015

बस आगे चलते जाना है

कुछ साये उलझे उलझे हैं
कुछ बातें भी उलझी उलझी

तुम सुलझा देना रातों को
जब चाँद भी हो उलझा उलझा

कोई साया है तो लौटेगा
फिर हाल हमारा पूछेगा

तुम भी तब पास में आ जाना
उसकी हाँ में हाँ तुम मिला जाना

एक आइना है जो टूटेगा
फिर कोई मुझसे रूठेगा

दिल की बातें दिल ही जाने
तुम अपने आप समझ जाना

कल कैसा होगा क्या जाने
फिर होंगे नए कुछ अफ़साने

यूँही छोटी छोटी बातों में
ये वक़्त गुज़रते जाएंगे

ये बेतरतीब ज़माना है
बस आगे चलते जाना है

बस आगे चलते जाना है।