बुधवार, 26 जून 2019

ग़ज़ल

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ऐसे ही खर्च हो रहा है, लाचार आदमी,
ज़िन्दगी की उधेड़बुन में, तार-तार आदमी।

सुबह से दौड़ रहा, शाम को है सुस्ताता,
यही लड़ाई लड़ रहा है, बार-बार आदमी।

कभी ख्वाब का खंजर, कभी हक़ीक़त का,
रोज़ लेता है अपने अंदर, आर-पार आदमी।

खुशी बिखेर के हंसता है अक्सर दुनिया पर,
ग़म में रो रहा है अकेले, ज़ार- जा़र आदमी।

मुलायम दिल भी कहाँ रह पाता है सदा वैसा,
फूल बनने की कोशिश में, खा़र-ख़ार आदमी।

गुनहगार

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गुनाह को जायज ठहराने के लिए
गुनहगार पैंतरे फेंकता है,

कहता है,
कि जिसको मारा वो चोर था,
कहता है
कि जिसको मारा वो गौ तस्कर था,
कहता है,
कि जिसको मारा वो बीफ खाता था,

गुनहगार होशियार है,
मगर कायर है।

वो खुल कर नहीं कहता कुछ,

वो नहीं कहता कि
जिसको मारा वो टोपी पहनता था
इसलिए मारा।

वो नहीं कहता कि
जिसको मारा वो जय श्री राम
नहीं कहता था
इसलिए मारा।

वो नहीं कहता कि
जिसको मारा वो वंदे मातरम
नहीं कहता था
इसलिए मारा।

वो नहीं कहता कि
जिसको मारा उसका नाम
तबरेज़ था
इसलिए मारा।

गुनहगार को गुनाह
कबूलने में शर्म आती है।

इसलिए अभी उसके
बदलने की गुंजाइश है।

गुनहगार से नफरत न करो,
उसे समझाओ,
कि वो जो कर रहा है वो गलत है।

गुनहगार मान जायेगा।

गुनहगार के दिल में नफरत है,
उसे प्यार से बुझाओ,

गुनहगार को अपने घर बुलाओ,
उससे पूछो,
कि उसे टोपी वालों से इतनी
नफरत क्यों है?

उससे पूछो
कि उसे तबरेज़ नाम वालों
से इतनी नफरत क्यों है?

उसे बताओ कि
कि तबरेज़ एक
शहर है ईरान का

उसे बताओ
कि एक सूफी था शम्स तबरेज़ी,
जिस से मिल कर रूमी
रूमी बन गया,
और दुनिया को प्यार का पैगाम दिया।

गुनहगार का
दिल पिघलेगा,

तब तक सब्र करो
और उम्मीद रखो,

कि खुदा
सब्र करने वालों के साथ होता है।

बुधवार, 19 जून 2019

ग़ज़ल

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लरजते होंठों का, आशिक हूँ सुर्ख गालों का
तुम्हें खबर नहीं, तुम्हारा मुंतज़िर हूँ सालों का।

एक तुम्हारी दीद ही से है मुझे उम्मीद वरना,
शिफा करेगा कौन, हम ख़राब हालों का।

खुदा सुनता नहीं फरियाद, मगर तुम तो सुन लो,
वरना शोर बरपेगा चहुँ ओर हमारे नालों का।

कहूँ मैं क्या? , कोई मेरा हाल क्यूँ पूछे ?
कबसे घेरे है मुझे खौफ इन सवालों का ।

बहुत सूनी है बस्ती हुस्न-ओ-इश्क की याँ पर,
अब्र बरसा दो, याँ आकर तुम्हारे बालों का।

सोमवार, 17 जून 2019

गैस की पाइपलाइन

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अखबार में खबर आई है,

२१ वी सदी की पहचान
गैस की पाइपलाइन बिछ रही है,

और उसे बिछाने को किया गया है
सड़क पर एक गड्ढा,

गड्ढे को भरने के लिए लाये गए हैं पत्थर,

और सड़क पर
पत्थर उठा रही है एक औरत,

पसीने से भरी हुई ,
पर हौसले से मजबूत,

पास में रखी है एक सीमेंट की बोरी
और उस पर सोया है
उसका बच्चा,

धुल और मिट्टी से सना हुआ
धुल और मिटटी के बीच,

फुटपाथ पर पलता हुआ ,
करवटें बदलता हुआ,

हमारा गणतंत्र ,
और उसका तिरंगा झंडा
खड़ा है वहीँ
शान से लहराता हुआ।

पास से एक
जुलूस निकल रहा है,
लोग नारा लगा रहे हैं।

जय हिन्द। 
जय हिन्द।  

सोमवार, 3 जून 2019

ग़जल


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लिख तो रहा था ख्वाबों के परचे का मैं जवाब,
सवाल कुछ ऐसे थे कि जवाब ही नहीं।

जब मेरी नाउम्मीदी मिली उसकी उम्मीद से,
बरस पड़े वो ऐसे कि हिसाब ही नहीं।

चल तो पड़ा हूँ जानिबे ग़ैब की तरफ,
पर जल चुका हूँ इतना कि वो ताब ही नहीं।

फुर्सत मिली गुनाह की, गुनाह कर लिया,
अब कर रहा हूँ नेकी पर सवाब ही नहीं।

ग़ज़ल


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इब्तदा ए इश्क का, कोई फसाना चाहता हूँ,
बात मुहब्बत की, मैं दोहराना चाहता हूँ ।।

तुम किस तरह मिले थे उस हर दिल अज़ीज़ से,
वो वाकया मैं सबको बताना चाहता हूँ ।।

दिल यूँ हीं तो तुम्हारा न हुआ होगा मुतमईन ,
वो किस्सा ए याराना , पुर ठिकाना चाहता हूँ ।।

लोग जीते हैं प्यार पर, और मरते हैं प्यार में,
दिल ढूँढता है जो, वो आब ओ दाना चाहता हूँ ।।

अमलतास के पीले फूल


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मई के महीने
में खिले हुए 
अमलतास के पीले फूल,

तुम्हारे कानों पर टंगे
सोने के पीले झुमकों
की तरह लटकते हैं।

हरी पत्तियों से
छुपे पीले फूल,
कुछ अधखुले से,
और कुछ पूरे खिले हुए,

इस मौसम में जब हर
कहीं रंग उड़े हुए नज़र आते हैं,
ये फूल गर्मियों को
बर्दाश्त करने की ताकत देते हैं।

ग़ज़ल

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दिल को अपनी ही हद से बेचैनी
आँख को हद की भी परवाह नहीं।


मुश्किलों से जो टकरा चुके हैं,
उनको आसानियों की चाह नहीं।

राह हर एक वहीं जाती है,
खुदा के घर की एक राह नहीं।

पल का साथ भी तो साथ है पर,
लोग कहते हैं वो हमराह नहीं।

हमने हर दर पे दी हैं आवाज़ें,
ढूंढता है जो वो गुमराह नहीं ।