गुरुवार, 12 सितंबर 2013

तुम्हारे पास

क्यों लगता है
फिर से खो जाऊँगा
वहीँ

जहाँ से लौट आया था मैं
बहुत पहले,

या कभी लौटा ही नहीं

तुमको देखता हूँ तो लगता है
कि  ठहर जाऊंगा अब

तुम्हारी  गोद में सर रख के सो जाऊंगा
फिर उसी नींद में जब

आँख डर के अचानक
नहीं खुलती,

जब जिंदगी का आज
कल के लिए  बेचैन नहीं रहता।

लगता है संभाल  पाओगी
तुम मुझे,

फिर भी नहीं छोड़ पाता
खुद को तुम्हारे पास





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