रविवार, 21 फ़रवरी 2010

धुल जो जम गयी है एहसासों पे
जैसे महीनो कोई हलचल न हुई हो

कल अचानक कुछ बूँदें टपक पड़ी
और उनपे लिखी इबारत नज़र आ गयी

एक अरसे पहले अपने हाथों करीने
से कुछ लिख दिया था यूँही;नहीं पता
था वो हम से कुछ ऐसे चिपक जाएगा

तब से कितने सावन गुज़रे पर वो गर्द
कभी साफ़ न हुई.

1 टिप्पणी:

संजय भास्कर ने कहा…

एक से बढ़कर एक ...सीधे दिल पर दस्तक देती हैं